Friday, 4 September 2009

हसरतों को अपनी , दफ़न कर दिया है,

बुझे हुए मन को भी बेमन कर दिया है,

मत कुरेदो मेरे अरमानो की राख को,

उस को भी विदाये जहन कर दिया है

Wednesday, 2 September 2009

मेरी पहली खुली ट्रेन यात्रा

हम चार अध्यापक उचाना से चलकर खुली मालगाडी में जींद पहुंचे ।

जी चाहता है...

कतल करने को जी चाहता है...
जान हरने को जी चाहता है॥
देखि जो उनकी आंखों में कातिलाना वहशत...
ख़ुद ही मरने को जी चाहता है...