Monday, 21 September 2009

ऐसा कहीं मंजर नही देखा

तुमने कभी ऐसा कहीं, मंजर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफिर ने , समंदर नहीं देखा
मैं अपनों में अन्जान बना ,जी ही रहा हूं
आँखों में रहा, दिल में उतर कर नहीं देखा

बे वक्त अगर जाऊँगा , सब चौंक पडेंगे

सालों से मैंने दिन में अपना घर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई, विरासत में नहीं मिले

तुमनेt मेरा कांटो भरा बिस्तर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है ,मुझे चाहने वाला
मै मोम हूँ, उसने मुझे छूकर नहीं देखा
अब रात है, मै फ़िर भी देखो जाग रहा हूँ
मैंने कभी रातों को भी ,सो कर नहीं देखा ।











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